40 رباعی دیگر خیام
خورشید کمند صبح بر بام افکند ... کیخسرو روز مهره در جام افکند
می خور که ندای عشق هنگام سحر ... آوازه ی «اشربوا» در ایام افکند (1)
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آمد سحری ندا ز میخانه ی ما ... کای رند خراباتی دیوانه ی ما
برخیز که پر کنیم پیمانه ز می ... زان پیش که پر کنند پیمانه ی ما (2)
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چون هست زمانه در شتاب ای ساقی ... بر نه به کفم شراب ناب ای ساقی
هنگام صبوح قفل بر در زده ام ... می ده که برآمد آفتاب ای ساقی (3)
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اکنون که جهان را به خوشی دسترسی است ... هر زنده دلی را سوی صحرا هوسی است
بر هر شاخی طلوع موسی دستی است ... در هر چمنی خروش عیسی نفسی است (4)
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روزیست خوش و هوا نه گرم است و نه سرد ... ابر از رخ گلزار همی شوید گرد
بلبل به زبان پهلوی با گل زرد ... فریاد همی زند که می باید خورد (5)
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هر روز بر آنم که کنم شب توبه ... از جام و پیاله ی لبالب توبه
اکنون که رسید وقت گل ترکم کن ... در موسم گل ز توبه یارب توبه (6)
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تا در تن توست استخوان و رگ و پی ... از خانه ی تقدیر منه بیرون پی
گردن منه ار خصم بود رستم زال ... منّت مکش ار دوست بود حاتم طی (7)
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تنگی می لعل خواهم و دیوانی ... سدّ رمقی باید و نصف نانی
وآنگه من و تو نشسته در ویرانی ... خوش تر بود از مملکت سلطانی (8)
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گل گفت که دست زر فشان آوردم ... خندان خندان سر به جهان آوردم
بند از سر کیسه برگرفتم ، رفتم ... هر نقد که بود در میان آوردم (9)
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ای دل همه اسباب جهان ساخته گیر ... دنیا همه سر به سر تو را خواسته گیر
وآنگه به روی آن چو در صحرا برف ... روزی دو سه بنشسته و برخاسته گیر (10)
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این کهنه رباط را که عالم نام است ... آرامگه ابلق صبح و شام است
بزمیست که وامانده ی صد جمشید است ... قصریست که تکیه گاه صد بهرام است (11)
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مگذار که غصه در کنارت گیرد ... واندوه مجال روزگارت گیرد
مگذار کتاب و لب یار و لب کشت ... زان پیش که خاک در کنارت گیرد (12)
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قومی متفکرند در مذهب و دین ... جمعی متحیرند در شک و یقین
ناگاه منادایی در آمد ز کمین ... کای بی خبران راه نه آن است و نه این (13)
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آنان که ز پیش رفته اند ای ساقی ... در خاک غرور خفته اند ای ساقی
رو باده خور و حقیقت از من بشنو ... باد است هر آن چه گفته اند ای ساقی (14)
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بازی بودم پریده از عالم راز ... شاید که برم ره ز نشیبی به فراز
این جا چو نیافتم کسی محرم راز ... زان در که در آمدم برون رفتم باز (15)
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آورد به اضطرارم اول به وجود ... جز حیرتم از جهان چیزی نفزود
رفتیم به اکراه و ندانیم چه بود ... زین آمدن و بودن و رفتن مقصود (16)
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اسرار ازل را نه تو دانی و نه من ... وین حرف معما نه تو خوانی و نه من
هست از پس پرده گفتگوی من و تو ... چون پرده برافتد نه تو مانی و نه من (17)
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دی کوزه گری بدیدم اندر بازار ... بر تازه گلی لگد همی زد بسیار
وآن گل به زبان حال با او می گفت ... من همچو تو بوده ام مرا نیکو دار (18)
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آنان که اسیر عقل و تمییز شدند ... در حسرت هست و نیست ناچیز شدند
رو بی خبری و آب انگور گزین ... کاین بی خبران به غوره میویز شدند (19)
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من باده به جام یک منی خواهم کرد ... خود را به دو رطل می غنی خواهم کرد
اول سه طلاق عقل و دین خواهم کرد ... پس دختر رز را به زنی خواهم کرد (20)
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من ظاهر نیستی و هستی دانم ... من باطن هر فراز و پستی دانم
با این همه از دانش خود شرمم باد ... گر مرتبه ای ورای مستی دانم (21)
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سرمست به میخانه گذر کردم دوش ... پیری دیدم مست و سبویی بر دوش
گفتم ز خدا شرم نداری ای پیر ... گفتا کرم از خداست رو باده بنوش (22)
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می خور که ز تو کثرت و قلّت ببرد ... واندیشه ی هفتاد و دو ملّت ببرد
پرهیز مکن ز کیمیایی که از او ... یک جرعه خوری هزار علّت ببرد (23)
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در دایره ی سپهر ناپیدا غور ... جامی است که جمله را چشانند به دور
نوبت چو به دور تو رسد آه مکش ... می نوش به خوشدلی که دور است به جور (24)
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ای رفته به چوگان قضا همچون گو ... چپ می رو و راست می رو و هیچ نگو
کان کس که تو را فکند اندر تک و پو ... او داند و او داند و او داند و او (25)
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از رفته قلم هیچ دگرگون نشود ... وز خوردن غم بجز جگر خون نشود
گر در همه عمر خویش خونابه خوری ... یک قطره از آن که هست افزون نشود (26)
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زین پیش نشان بودنی ها بوده است ... پیوسته قلم ز نیک و بد ناسوده است
در روز ازل هر آن چه بایست بداد ... غم خوردن و کوشیدن ما بیهوده است (27)
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آن روز که توسن فلک زین کردند ... وآرایش مشتری و پروین کردند
این بود نصیب ما ز دیوان قضا ... ما را چه گنه قسمت ما این کردند (28)
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چون جود ازل بودِ مرا انشا کرد ... بر من ز نخست درس عشق املا کرد
وآنگاه قراضه ریزه ی قلب مرا ... مفتاح در خزینه ی معنا کرد (29)
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با تو به خرابات اگر گویم راز ... به زآنکه به محراب کنم بی تو نماز
ای اول و ای آخر خلقان همه تو ... خواهی تو مرا بسوز خواهی بنواز (30)
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بر رهگذرم هزار جا دام نهی ... گویی که بگیرمت اگر گام نهی
یک ذره جهان ز حکم تو خالی نیست ... حکمم تو کنی و عاصیم نام نهی (31)
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در کارگه کوزه گری رفتم دوش ... دیدم دو هزار کوزه گویا و خموش
ناگاه یکی کوزه برآورد خروش ... کو کوزه گر و کوزه خر و کوزه فروش (32)
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جامی است که عقل آفرین می زندش ... صد بوسه ز مهر بر جبین می زندش
این کوزه گر دهر چنین جام لطیف ... می سازد و باز بر زمین می زندش (33)
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گویند به حشر گفتگو خواهد بود ... آن یار عزیز تندخو خواهد بود
از خیّر محض بد نیاید هرگز ... خوش باش که عاقبت نکو خواهد بود (34)
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ماه رمضان برفت و شوّال آمد ... هنگام نشاط و عیش و قوّال آمد
آمد گه آن که خیک ها اندر دوش ... گویند که پشت پشت حمّال آمد (35)
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زینهار مرا ز جام می قوت کنید ... وین چهره ی کهربا چو یاقوت کنید
چون درگذرم به مِی بشویید مرا ... وز چوب رَزَم تخته ی تابوت کنید (36)
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چندان بخورم شراب کین بوی شراب ... آید ز تراب چون شوم زیر تراب
گر بر سر خاک من رسد مخموری ... از بوی شراب من شود مست و خراب (37)
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گر بر فلکم دست بدی چون یزدان ... برداشتمی من این فلک را ز میان
وز نو فلکی دگر چنان ساختمی ... کآزاده به کام دل رسیدی آسان (38)
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یاران چو به اتفاق دیدار کنید ... باید که ز دوست یاد بسیار کنید
چون باده ی خوشگوار نوشید به هم ... نوبت چو به ما رسد نگونسار کنید (39)
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طبعم به نماز و روزه چون مایل شد ... گفتم که نجات کلی ام حاصل شد
افسوس که آن وضو به بادی بشکست ... وین روزه به نیم جرعه می باطل شد (40)
